चार साल बाद मलाला यूसुफजई की पाकिस्तान में वापसी, विरोधियों के मुंह पर तमाचा

loading...

मलाला युसूफज़ई, नाम तो आपने भी सुना ही होगा….!!!मलाला एक बार फिर से चर्चा में हैं. चार सालों के बाद मलाला की अपने वतन वापसी हुई. वो अपने चार दिनों के पाकिस्तान दौरे पर इस्लामाबाद और सवात में अपनी फैमिली के साथ समय गुज़ारने के बाद इंग्लैंड वापस लौट गयी हैं.

मलाला यूसुफजई

उसी दिन से सोशल मीडिया पर कुछ फेस्बुकियों ने मलाला के बारे में फिर से दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया है. ये असल में घृणा, जलन और द्वेष से भरे हुए लोग हैं जो की मलाला की कामयाबी से जलते हैं. ये ऐसे लोग हैं जो किसी को भी जिंदगी में आगे बढ़ते हुए देखना नहीं चाहते. इन्हें तो अपने दोस्तों की पोस्ट पर अधिक लाइक्स देखकर भी जलन होने लगती है.

loading...

loading...

हमारे समाज में जो व्यक्ति अपने कठिन परिश्रम या बौद्धिक क्षमता के बल पर हम से आगे बढ़ जाता है, समझ लीजिये की हमारा उस से खुदा वास्ते का बैर हो जाता है. हमारा कोई सहकर्मी यदि आगे चलकर अपनी मेहनत या बुद्धि के बल पर कोई बड़ा अफसर बन जाए, या कोई बड़ा व्यवसायी बन जाए तो भी हमें उस से भी चिढ होने लगती है. शायद ऐसा इसलिए भी होता है की हम अपने से किसी भी बड़े व्यक्ति बारे में बहुत से नकारात्मक विचार अपने मन में पाल लेते हैं. अब तो स्थिति यह हो गयी है की किसी भी सफल व्यक्ति को हम विवादित बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. किसी को हम पश्चिमी देशों का एजेंट घोषित कर देते हैं तो किसी को यहूदियों के एजेंडे पर काम करने वाला घोषित कर देते हैं. असल में अपने इलावा अन्य लोगों के बारे में हमारी सोच नकारात्मक ही होती है. और हमारी सोच तब तक नकारात्मक ही रहती है जब तक की इसे हम खुद से इस सोच का अंतिम संस्कार नहीं कर देते. अगर आज आप भारत के दस निर्विवादित व्यक्ति की लिस्ट बनाने बैठें तो शायद नहीं बना पायेंगे, क्यूंकि हर व्यक्ति के ऊपर कीचड़ उछालकर हमने खुद उसके व्यक्तित्व को दागदार बना दिया है. आजकल मलाला युसूफज़ई के साथ भी भारत और पकिस्तान की सोशल मीडिया के फेस्बुकिया मुजाहिदीन भी यही सब कर रहे हैं लेकिन अल्लाह के करम से अल्ला पाक ने मलाला को इतनी इज्जत दी है की ये फेस्बुकिया मुजाहिदीन सिवाय अपना सर पीटने और अपने बाल नोचने के इलावा कुछ नहीं कर सकते हैं.

मलाला यूसुफजई

मलाला से ऐसे लोग नफरत क्यूँ करते हैं, इस बात का इनके पास कोई तर्कसंगत जवाब नहीं होता है. मलाला की पहली गलती यह है की उस ने अपने जीवन में एक स्टैंड लिया. जब तालिबान मलाला के शहर सवात पर कब्ज़ा किये हुए थे तब मलाला ने तालिबानियों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत की.

मलाला यूसुफजई

एक ऐसे देश में जहाँ पर किसी थाने के हवालदार से भी यदि दुआ सलाम हो तो लोग उसे अपनी बहुत बड़ी उपलधि समझते हों, वहां एक बारह-चौदह साल की बच्ची मलाला का तालिबानियों के खिलाफ स्टैंड लेना उसकी निडरता और शौर्य की बहुत बड़ी मिसाल थी.

मलाला के इसी गुनाहं के जुर्म में तालिबान ने उसे गोलियां मारीं जब वो अपने स्कूल-बस में स्कूल जा रही थी. उस गोलीबारी में मलाला के ज़िंदा बच जाने पर तालिबानियों का यह बयान आया की, “अगर मौका मिला तो उसे फिर से गोलियां मारेंगे.” अब हम लोग तो ठहरे कायर और डरपोक, हम इतनी आसानी से कैसे मान लेते की एक बारह-चौदह साल की बच्ची मलाला हम से अधिक बहादुर हो सकती है. बस हमारी पूरी कौम मलाला के पीछे पड़ गयी. किसी ने कहा की ये मलाला नहीं ड्रामा है, तो किसी ने कहा की उसे गोलियां ही नहीं लगीं. हद तो तब हो गयी जब लोगों ने सोशल मीडिया पर डायग्राम तक बना कर सिद्ध करने की कोशिश की के मलाला को गोली नहीं लगी है क्यूंकि यदि उसे सर में गोली लगी होती तो ज़िंदा ही नहीं बच पाती. हालंकि ऐसी बातें वही लोग कर रहे थे जो की खुद भी यह कहते नहीं थकते हैं कि, “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है.” अब इन फेस्बुकिया मुजाहिदीनों से कोई पूछे कि यदि मलाला को गोली नहीं लगी थी तो फिर उसके देश का राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, सेना प्रमुख, डाक्टर और नर्सें इत्यादि भी क्या मलाला के इलाज का ड्रामा कर रहे थे.??

मलाला को गोली लगने के बाद मलाला की निडरता और बहादुरी को स्वीकार करते हुए दुनिया ने मलाला को सर पर उठा लिया. कनाडा ने उसे मानद नागरिकता दिया तो, संयुक्त राष्ट्र संघ में मलाला का खड़े हो कर स्वागत किया, मलाला को यूरोपियन संघ के प्रतिष्ठित सखारोव मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अमेरिकी राष्ट्रपति सहित दुनिया भर के प्रतिनिधि मलाला से मिलना गर्व की बात समझते हैं, ऑक्सफ़ोर्ड में मलाला को एडमिशन मिल गया, तो अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में मलाला के कामों को खूब सराहा जाता है. मलाला को लेक्चर देने और बड़े-बड़े सम्मेलनों में आमंत्रित किया जाता है. मलाला आज बहादुरी की एक ज़िंदा मिसाल है.

लेकिन सोशल मीडिया के इन फेस्बुकिया मुजाहिदीन को यह सब स्वीकार्य नहीं है इसीलिए यह मलाला को यहूदियों की एजेंट और पश्चिमी देशों की एजेंट घोषित करते हैं. ये सोचते हैं की पश्चिमी देश शायद मलाला को इसीलिए इतना सम्मान दे रहे हैं क्यूंकि मलाला उनकी एजेंट है. इनके फेस्बुकिया मुजाहिदीनों के तर्क होते हैं की जिन पश्चिमी देशों की नजर में हमारा इस्लाम इतना अधिक खटकता हो, जो इस्लाम को आतंकवाद घोषित करने पर तुले रहते हों, जो पश्चिमी देश हमारे अच्छे खासे कारनामों पर भी हमें घास नहीं डालते हों अगर वो पश्चिमी देश मलाला को इतना अधिक सम्मान, पुरस्कार इत्यादि दे रहे हैं तो इसका मतलब है की मलाला यहूदियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है और ज़रूर यहूदियों की एजेंट है. कल को यहूदी और पश्चिमी देश मलाला को इस्लाम के खिलाफ इस्तेमाल करेंगे. यह मलाला को एक अंतर्राष्ट्रीय साज़िश मानते हैं. ये सोचते हैं की संयुक्त राष्ट्र संघ, अमेरिका, अंतर्राष्ट्रीय मिडिया और पश्चिमी देश हमेशा किसी ऐसे व्यक्तित्व को ही प्रमोट करते हैं जिनका इस्तेमाल इस्लाम विरोधी गतिविधियों में किया जा सके.

आप ऐसे फेस्बुकिया मुजाहिदीनों से पूछिए की आज के समय में इस्लाम का नाम जितना रौशन अकेले मलाला युसुफज़ई ने किया है उतना पूरी उम्मत के मुसलमान मिलकर नहीं कर सके. मलाला जिस किसी समारोह में जाती है वहां वो एक मुसलमान की हैसियत से जाती है. अगर इस्लाम का नाम इस से भी अधिक किसी और तरीके से रौशन होता हो तो बता दीजियेगा. जितने बड़े विश्वस्तरीय स्तर के मंचों पर मलाला ने एक मुसलमान की हैसियत से हिस्सा लिया है, अगर कोई दूसरा मुसलमान भी वहां तक पहुंचा हो तो बता दीजियेगा. मानता हूँ की मलाला से भी अधिक क्षमता वाले युवा उस देश में रहे होंगे लेकिन तालिबानी आतंकवाद के सामने मुंह खोलने की किसी की भी हिम्मत नहीं हुई. तालिबानी आतंकवादियों ने किसी अन्य का नाम पूछ कर उसको गोली नहीं मारी थी. मलाला को तालिबानी आतंकवादियों ने केवल इसलिए गोली मार दी थी की उस निहत्थी लड़की ने उस समय तालिबानियों के खिलाफ आवाज़ उठायी जब कोई दूसरा उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था. आतंकवाद से लड़ाई में बेशक हमारे देश ने भी अनेकों जवानों को खोया है. किसी को वीर चक्र मिलता है तो किसी को परमवीर मिलता है, लेकिन दुसरे देश भी तो यही सब करते हैं. इसी तरह के पुरस्कार तो वहां के भी वीरों को दिए जाते हैं. हाँ मलाला पर अगर अल्लाह पाक का ख़ास करम हुआ तो क्या हम फ़क़त इसी बात से उस लड़की से नफरत करना शुरू कर दें की पश्चिमी देशों ने बाकी के भी नोबल सम्मान मुसलामानों को ही क्यूँ नहीं दिए…??? और फिर हम गय्यूर मुसलामानों को पश्चिमी देशों का मुंह ताकने की ज़रुरत ही क्या है…??? दुनिया भर के गय्यूर मुसलामानों को नोबल पुरस्कार से भी बड़ा वैभवशाली पुरस्कार बनाने से किसी ने रोका है क्या…??? बनाइये खुद का अपना पुरस्कार और दीजिये आफिया सिद्दीकी, से लेकर तैयब एरदोगन तक को. उन सब को चुन चुन कर सम्मानित कीजिये जिनको आप चाहते हैं. लेकिन नहीं, आपका तर्क तो ये होता है की पश्चिमी देश भी अपना नोबल सम्मान आप से ही पूछकर दें, या फिर यदि पश्चिमी देशों ने मलाला को नोबल सम्मान दिया है तो साथ हमारी पसंद के अमुक व्यक्ति को भी दिया जाना चाहिए.

विडंबना देखिये की हम मुसलमान एक ओर तो पूरी दुनिया से ये शिकायत भी करते हैं की अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों, सम्मानों इत्यादि में मुसलामानों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है, और दूसरी ओर हम खुद ही एक मुसलमान बच्ची मलाला को मिले नोबल सम्मान को यहूदियों की साज़िश और पश्चिमी देशों की साज़िश करार देते हैं. यह हमारी बहुत ही उच्चस्तरीय दोगलई है. गौर कीजियेगा की हम कौन लोग हैं जो इस प्रकार की उच्चस्तरीय दोगली मानसिकता रखते हैं.

मलाला अब बड़ी हो चुकी हैं. अब वो बच्ची नहीं रहीं. अब मलाला का फ़र्ज़ बनता है की वो एक एक शब्द बहुत ही सोच समझकर बोले. वह कैसे रहती है, कहाँ पढ़ती है, क्या पढ़ती है, किसके साथ पढ़ती है, क्या पहनती है, दुनिया वाले उसकी एक एक गतिविधि नोट करते हैं. ऐसे में मलाला की यह जिम्मेदारी बनती है की वह जाने अनजाने में या मासूमियत में ऐसी कोई हरकत न कर बैठे, या ऐसा कोई बयान न दे दे जिस से उसकी बनी बनायी इज्ज़त को कोई नुक्सान पहुंचे. एक बहुत मामूली सी चूक भी मलाला को कोई बहुत बड़ा नुक्सान पहुंचा सकती है. क्यूंकि भारत और पकिस्तान के फेस्बुकिया मुजाहिदीन की एक पूरी फ़ौज उसकी मामूली सी चूक या गलती के इंतज़ार में पहले से ही बैठी हुई है.

loading...